Wednesday, September 10, 2025

षड्रिपु

काम, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या, और द्वेष हिंदू दर्शन में षड्रिपु (छह शत्रु) के रूप में जाने जाते हैं। ये मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में बाधा डालने वाले प्रमुख दोष या दुर्गुण माने जाते हैं। इन पर विजय प्राप्त करके ही आत्मज्ञान की प्राप्ति की जा सकती है। आइए इनके बारे में संक्षेप में समझें:
काम (इच्छा/वासना):  
यह सांसारिक सुखों और भौतिक इच्छाओं की ओर आकर्षण है।  
नियंत्रण: संयम, ब्रह्मचर्य, और ध्यान से इसे वश में किया जा सकता है।

क्रोध (गुस्सा):  
जब इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध उत्पन्न होता है।  
नियंत्रण: क्षमा, धैर्य, और शांत मन से इसे दूर करें।

मोह (आसक्ति):  
व्यक्तियों, वस्तुओं या परिस्थितियों से अंधा लगाव।  
नियंत्रण: वैराग्य (detachment) और आत्मचिंतन से इसे कम करें।

लोभ (लालच):  
अधिक पाने की अनियंत्रित इच्छा।  
नियंत्रण: संतोष और दान की भावना से इसे नियंत्रित करें।

ईर्ष्या (जलन):  
दूसरों की उन्नति या सुख से असंतोष।  
नियंत्रण: समता भाव और दूसरों के लिए शुभकामना से इसे खत्म करें।

द्वेष (घृणा):  
दूसरों के प्रति नफरत या शत्रुता।  
नियंत्रण: प्रेम, करुणा, और अहिंसा से इसे दूर करें।

इन पर विजय कैसे पाएं?
साधना: रोजाना ध्यान, योग, और प्राणायाम से मन को शांत करें।

सत्संग: अच्छे लोगों और गुरुओं के साथ समय बिताएं।

स्वाध्याय: शास्त्रों का अध्ययन करें, जैसे भगवद्गीता, जो इन दोषों पर काबू पाने के उपाय सिखाती है।

निस्वार्थ कर्म: बिना फल की इच्छा के कार्य करें।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन दुर्गुणों पर विजय पाने के लिए मन को वश में करना जरूरी है, और यह तभी संभव है जब आत्मा ईश्वर के प्रति समर्पित हो।

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