१ संचित कर्म
२ प्रारब्ध कर्म
३ क्रियमाण कर्म
१ संचित कर्म - यह पिछले कई जन्मों के किए गए पुण्य एवं पाप कर्म का भण्डारण होता है जो आत्मा के साथ संचित रहता है इसी के आधार पर वर्तमान एवं भविष्य के फल निर्धारित होते हैं जैसे कि आपका वर्तमान कैसा बीत रहा और भविष्य या अगला जन्म कैसे बीतेगा ।
२ प्रारब्ध कर्म - यह वो कर्म होता है जो संचित कर्मों में से वर्तमान जन्म के लिए चुना जाता है, इसे भोगना ही पड़ता है चाहे कुछ भी हो जाए, इस जन्म में आप कितना भी अच्छा या बुरा कर्म करें लेकिन उसका फल आपको इस जन्म में नहीं मिलेगा क्योंकि अगर आपके संचित कर्म ने प्रारब्ध के लिए दुःख चुना है तो दुःख ही भोगना पड़ेगा भले ही आप इस जन्म में पुण्य कर्म करें और अगर आपको सुख भोगना लिखा है तो आप कितना भी बुरा कर्म करें आप सुखी रहेंगे, इसी कर्म से वर्तमान जीवन की परिस्थितियों, जैसे जन्म, परिवार, स्वास्थ्य, सुख-दुख आदि को निर्धारित होती हैं।
३. क्रियमाण कर्म - ये वो कर्म हैं जो हम वर्तमान जन्म में कर रहे हैं पुण्य या पाप ये सब आपके संचित कर्मों में संचित होता रहता है , जो अगले जन्म में आपका प्रारब्ध तय करेगा ।