Friday, September 19, 2025

कर्मफल

कर्मफल :- कर्मफल मुख्यतः विद्वानों ने तीन तरह के बताएं हैं -
१ संचित कर्म 
२ प्रारब्ध कर्म 
३ क्रियमाण कर्म
१ संचित कर्म - यह पिछले कई जन्मों के किए गए पुण्य एवं पाप कर्म का भण्डारण होता है जो आत्मा के साथ संचित रहता है इसी के आधार पर वर्तमान एवं भविष्य के फल निर्धारित होते हैं जैसे कि आपका वर्तमान कैसा बीत रहा और भविष्य या अगला जन्म कैसे बीतेगा ।
२ प्रारब्ध कर्म - यह वो कर्म होता है जो संचित कर्मों में से वर्तमान जन्म के लिए चुना जाता है, इसे भोगना ही पड़ता है चाहे कुछ भी हो जाए, इस जन्म में आप कितना भी अच्छा या बुरा कर्म करें लेकिन उसका फल आपको इस जन्म में नहीं मिलेगा क्योंकि अगर आपके संचित कर्म ने प्रारब्ध के लिए दुःख चुना है तो दुःख ही भोगना पड़ेगा भले ही आप इस जन्म में पुण्य कर्म करें और अगर आपको सुख भोगना लिखा है तो आप कितना भी बुरा कर्म करें आप सुखी रहेंगे, इसी कर्म से वर्तमान जीवन की परिस्थितियों, जैसे जन्म, परिवार, स्वास्थ्य, सुख-दुख आदि को निर्धारित होती हैं।
३. क्रियमाण कर्म - ये वो कर्म हैं जो हम वर्तमान जन्म में कर रहे हैं पुण्य या पाप ये सब आपके संचित कर्मों में संचित होता रहता है , जो अगले जन्म में आपका प्रारब्ध तय करेगा ।

Wednesday, September 10, 2025

टेक्नोलॉजी मित्र या शत्रु?

टेक्नोलॉजी के फायदे कम नुकसान ज्यादा हैं,आज से 15-20 साल पहले सभी जाति के लोग एक साथ पढ़ते-लिखते,खेलते-कुदते, लड़ते -झगडते थे और फिर एक हो जाते थे, समाजिक अपराध भी होते थे पर आज की तरह एक-दूसरे के प्रति नफ़रत की भावना इतनी चरम पर नहीं थी,जो मुख्य अपराधी होता था सजा सिर्फ उसको ही मिलती थी पुडे समाज-परिवार को नहीं,पर आजकल तो लोग बस एक मोके की तलाश में रहते हैं कि आपके घर-परिवार-समाज ने ऐसा किया- वैसा किया,आप सभी भी उसी के पात्र हैं वगैरा -वगैरा और ये सभी जाति-समाज में चालू है क्योंकि वर्तमान में टेक्नोलॉजी का एक ऐसा टेक्नो-ईकोसिस्टम चालू है जिसका काम समाजिक द्वेष फैलाना ही मात्र एक काम है और ऐसे-ऐसे तर्क प्रस्तुत करता है कि समाज उसे सच मान लेता है फेसबुक,व्हाट्स एप,यूट्यूब, स्मार्टफोन,जियो 4जी आदि के आने के बाद समाज का क्या हाल है सब को पता है ? बच्चे पैदा होते ही मोबाइल देखकर खुश हो जाते हैं और माता पिता भी अपना समय बचानें के लिए उन्हें मोबाइल देकर स्वतंत्र हो जातें हैं फिर वो उसका उपयोग करें या दुरउपयोग किसी से कोई मतलब नहीं और यहीं से जन्म लेता है अपराध जब समाज, परिवार,जाति, धर्म-कर्म ही नष्ट -भ्रष्ट हो जाएंगे तो क्या मतलब ऐसे विकृत-विकसित मानसिक समाज का ?

मित्र नहीं शत्रु

हमारे जीवन में मित्र और शत्रु बड़े मयाने रखते हैं, मित्र वो जो हमारा हित चाहे जो हमारे सुख दुःख में हमारी सहायता करे, हमारा साथ दे कुछ मित्र जन्म से बनतें हैं, कुछ मित्र हम स्वयं बनाते हैं, कुछ मित्र परिवार में मिल जाते हैं तो कुछ जीवन की यात्रा में परन्तु शत्रु हमें जीवन में कभी भी मिल जाते हैं, मैंने ज्यादातर मित्रों को ही शत्रु बनते भी देखा है क्योंकि एक मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर लोग आपकी तरक्की से जलते हैं और उनमें आपके कुछ मित्र भी हो सकतें हैं इसलिए मित्र मंडली हमेशा सोच समझकर बनानी चाहिए। पता नहीं कब वो आपका शत्रु बन जाए और आपको नीचा गिराने के लिए दिन-रात षड्यंत्र करने लगे।

षड्रिपु

काम, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या, और द्वेष हिंदू दर्शन में षड्रिपु (छह शत्रु) के रूप में जाने जाते हैं। ये मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में बाधा डालने वाले प्रमुख दोष या दुर्गुण माने जाते हैं। इन पर विजय प्राप्त करके ही आत्मज्ञान की प्राप्ति की जा सकती है। आइए इनके बारे में संक्षेप में समझें:
काम (इच्छा/वासना):  
यह सांसारिक सुखों और भौतिक इच्छाओं की ओर आकर्षण है।  
नियंत्रण: संयम, ब्रह्मचर्य, और ध्यान से इसे वश में किया जा सकता है।

क्रोध (गुस्सा):  
जब इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, तो क्रोध उत्पन्न होता है।  
नियंत्रण: क्षमा, धैर्य, और शांत मन से इसे दूर करें।

मोह (आसक्ति):  
व्यक्तियों, वस्तुओं या परिस्थितियों से अंधा लगाव।  
नियंत्रण: वैराग्य (detachment) और आत्मचिंतन से इसे कम करें।

लोभ (लालच):  
अधिक पाने की अनियंत्रित इच्छा।  
नियंत्रण: संतोष और दान की भावना से इसे नियंत्रित करें।

ईर्ष्या (जलन):  
दूसरों की उन्नति या सुख से असंतोष।  
नियंत्रण: समता भाव और दूसरों के लिए शुभकामना से इसे खत्म करें।

द्वेष (घृणा):  
दूसरों के प्रति नफरत या शत्रुता।  
नियंत्रण: प्रेम, करुणा, और अहिंसा से इसे दूर करें।

इन पर विजय कैसे पाएं?
साधना: रोजाना ध्यान, योग, और प्राणायाम से मन को शांत करें।

सत्संग: अच्छे लोगों और गुरुओं के साथ समय बिताएं।

स्वाध्याय: शास्त्रों का अध्ययन करें, जैसे भगवद्गीता, जो इन दोषों पर काबू पाने के उपाय सिखाती है।

निस्वार्थ कर्म: बिना फल की इच्छा के कार्य करें।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन दुर्गुणों पर विजय पाने के लिए मन को वश में करना जरूरी है, और यह तभी संभव है जब आत्मा ईश्वर के प्रति समर्पित हो।

महत्वकांक्षा

जब कोई व्यक्ति किसी महत्वकांक्षा को लेकर कोई कार्य करता है और वह जब पुर्ण नहीं होती तब वह उसे पुर्ण करने के लिए बहुत छटपटाता है यहीं पर मनुष्य के स्वाभाव व उसके व्यक्तित्व का परिचय होता है कोई उछल-कुद करके बर्बाद हो जाता है, कोई शांत रहकर नये -नये अवसरों की खोज में लग जाता है अब फैसला आपको करना है आप की कौन सी महत्वकांक्षा पुरी नहीं हुई कहीं आपके छटपटाने या शांत रहने की वजह वही तो नहीं अर्थात आप सब क्या कर रहें हैं न जाने कौन सी किसकी महत्वकांक्षा अभी बाकी है, ये महत्वकांक्षा कुछ भी हो सकती है और ये सबकी हो सकती है फर्क सिर्फ इतना रहेगा लोगों की हैसियत के हिसाब से बड़ी-छोटी होती जाएगी और कुछ लोगों की नित-दिन नई-नई महत्वकांक्षा जागती रहती है लेकिन आपकी इन महत्वकांक्षाओं के पुर्ण या अपूर्ण होने के दौरान कई निर्दोष व बेगुनाह लोग बकरे की बली की तरह चढ़ जातें हैं कृपया अपनी महत्वकांक्षा पुर्ण या अपूर्ण होने के दौरान मानवता को जिंदा रखिए। इस पोस्ट को कृपया कोई व्यक्तिगत न ले, ये सम्पूर्ण मानव समाज के लिए है जो कहीं न कहीं अपनी मानवता,आध्यात्मिकता, सामाजिकता,व्यवहारिकता खो रहा है।

Monday, September 8, 2025

चंद्रमा और मानव मन

The moon controls human behaviour, It IS observed that when the moon is going dark, the human behaviour is going so root and bad and when the moon is going bright period the human behaviour is going good behaviour